२४. ” मृगनयनी “
(…..आगे…..)
सुशी और सुश्या में चलती थीं बातें अपार,
परीक्षा के बाद सुशी को कल लौटना था घर,
इस एहसास से ही दोनों का मन चाहता था,
यह रात यूँ चलती रहे,
शब्दों की शमा जलती रहे, हर पल यूँ ही संजोते रहें,
वक़्त मानो थम सा गया था,
सुश्या ने फिर रच दी एक कविता,
दोनों के स्नेह की चुप-चुप सी गाथा –
” रात की चुप्पी में जब सब थम सा गया है,
बस तेरी हँसी और तेरी आँखों की चमक मेरे चारों ओर बिखर गई है।
चाँद-तारों ने भी बाँधे है अपने सपनों के डोरे,
आज रात, स्नेह ने सजाए है सारे।
धीमे-धीमे टिमटिमाता है तारा,
हर पल खिंचता है तेरा और मेरा किनारा,
हाथों में हाथ आ जाते हैं चुपचाप,
चाँद भी तेरी सुंदरता से हो जाता है बेताब।
तुम मृगनयनी!
तू खुद में एक सजीव, श्रृंगार-काव्य की लेखनी है,
चंद्रमा भी तेरे सौंदर्य के आगे नत मस्तक हो गया है,
हर क्षण तू नई मधुर यादें रचती है,
तेरे बिना शब्द अधूरे लगते हैं,
हर स्मृति अधूरी, हर भावना मौन हो जाती है।
तेरी आँखों की नमी, तेरा मुस्कुराना,
तेरे मन का सौंदर्य, जैसे कोई अमूल्य खज़ाना,
जैसे कोकण के विस्तृत किनारे पर लहराता नील सागर…”
– सुश्या
