मंज़िल की तलाश : कामयाबी या सुकून?
ना जाने क्यों,
अचानक से आज थकान सी महसूस हुई, …शरीर की नहीं,
दौड़ तो अभी भी आखिरी मंजिल के आगे लगाने में जारी है,
लेकिन मन की थकावट…जैसे एक पल में बैटरी खत्म हो गई हो।
शायद हां, महीने गिनते गिनते साल बीत गए, कही treck पर गए, battery तो dry होनी ही है।😄
किसी की पंक्तियां याद आ रही है…
” इतना तो जीना भी नहीं जितना तू मर रहा है,
ख्वाहिशों के बोझ में बशर(मनुष्य) तू क्या क्या कर रहा है…
हमें सुकून में कामयाबी दिखाई दी तो हम ठहर गए,
उन्हें कामयाबी में सुकून नजर आया तो वो दौड़ते गए…”
सच में,
हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ सफलता का अर्थ सिर्फ़ “आगे बढ़ना” रह गया है।
हर कोई दौड़ रहा है…
कोई मंज़िल की ओर, कोई पहचान की ओर, कोई बस भीड़ से आगे निकलने की ओर।
मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह जीवित रहते हुए भी जीना भूल जाता है।
उसकी हर साँस किसी न किसी “चाहत” की गिरफ्त में होती है।
वो चाहता है थोड़ा और…
थोड़ा और पैसा, …थोड़ा और नाम, …थोड़ा और सुख।
लेकिन इसी “थोड़ा और” की तलाश में वह अपने भीतर के सुकून को खो देता है।
वो जीता नहीं, बस जीने की तैयारी में उम्र गुज़ार देता है।
मगर इस दौड़ में एक आवाज़ धीरे-धीरे दबती जा रही है…
हमारे भीतर की आवाज़।
और
अनजाने में ही निशब्द मैं अपने आप से बोल पड़ा,
“ रुक जा ज़रा, सुकून भी एक मंज़िल है।
कभी रुका है तू, ऐ बशर(मानव)?
कभी अपनी साँसों की थकान सुनी है?
मेरे चेहरे पर जो मुस्कान है,
वो कितने समझौतों के पीछे छुपी है,
क्या कभी सोचा है मैने?
मेरी आँखों में सपनों का ज्वार है,
पर दिल में एक सन्नाटा भी तो है।
ऐ बशर(मानव) जी रहा है … पर किसके लिए?
हर दिन किसी मंज़िल की तरफ़ दौड़ता है,
पर क्या कभी उस मंज़िल से पूछा,
वो तेरा इंतज़ार भी करती है क्या? “
ऐ मानव,
” तू सब पाना चाहता है…
नाम, पैसा, पहचान,
मुकाम हर मंजिल पे चढ़ रहा है तो,
शायद आसमान को छू रहा है तू…
पर क्या तूने खुद को पाया है?
क्या तेरे भीतर वो मासूमियत अब भी ज़िंदा है
जो बिन वजह मुस्कुराती थी?
क्या वो सपने, क्या वो पागलपन..
अब भी तेरे दिल में है,
जिसने तुम्हे अपने आप से कभी प्यार करवाया था?
तेरी हर साँस किसी न किसी अधूरी चाह में बंधी है।
कभी तू नाम चाहता है, कभी मान, कभी पहचान।
पर हर इच्छा पूरी होते ही एक नई कमी जन्म ले लेती है।
और
सुकून तो आत्मा की मंज़िल है,
जहाँ पहुँचकर तू महसूस करता है…
कि तेरा मिलना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। “
गहराई से सोचने पर ध्यान में आता है…
कुछ लोग ठहरकर जीतते हैं,
और कुछ दौड़ते-दौड़ते हार जाते हैं।
सुकून भी एक जीत है, एक लय है, एक संगीत है।
दौड़ते दौड़ते मैं सुकून को सफलता में ढूंढता रहा,
सफलता फिसल गई तो सुकून भी नजर ना आया,
और सफलता मिल गई तो सुकून दूर कही नई मंजिल के पीछे से बुला रहा था मुझे,
….. या हंस रहा था मेरे ऊपर?
लिखते लिखते.. एक मुस्कान मेरे चेहरे पर आ गई,
सुहास के नाम का अहसास कुछ पल करा गई….
थके हुए मन ने मनोविज्ञान में मुझे ढकेल दिया,
मैं गुम हो रहा हूं और कलम शायद गुमशुदा सुकून ढूंढ रही है।
सुकून का तो पता नहीं,
एक मुस्कुराहट आज फिर मिल गई,
कभी ना सोचा था पर थोड़ी बहुत शायरी भी शायद लिखीं गई। 😄😄😄
जो लोग सुकून को सफलता के बाद ढूँढते हैं,
वो उम्र भर तलाश में रहते हैं।
क्योंकि सफलता बदलती है,
पर सुकून वो एक बार मिल जाए,
तो जीवन भर साथ रहता है।
जो सुकून को सफलता के बाद ढूँढते हैं,
सुकून उन्हें छू कर आगे भागता है
क्यों कि,
अगले कदम पर सफलता की और एक सीढ़ी बन रही होती है,
शायद ही सुकून से सुकून भरी बातें वो कर पाते होंगे।
शायद, सुकून वही क्षण है जब मन कहे…
“अब और कुछ नहीं चाहिए,
क्योंकि मैं खुद को पा चुका हूँ।”
यही वह क्षण है जहाँ आत्मा मुस्कुराती है,
जहाँ बाहरी शोर शांत हो जाता है,
और भीतर की आवाज़ स्पष्ट सुनाई देती है।
” रुक जा ज़रा, खुद से मिल ले “
मेरे दिल से आवाज निकलती है कभी…
और मैं अपने आप से कह जाता हूं,
” तू दौड़ते-दौड़ते रुक जा एक पल,
साँसों की आवाज़ सुन…
एक साँस भर,
अपने दिल पर हाथ रख,
और महसूस कर…
ज़िन्दगी अब भी तेरे भीतर धड़क रही है।
तेरी मंज़िल कहीं बाहर नहीं,
वो तेरे भीतर ही है..
जिसके लिए तू भाग रहा है..
वहीं तो है सुकून और उसके आगे तेरी मुस्कुराहट..
पहचान ये,
थोड़ा रुक ले,
एक पल के लिए मुस्कुरा ले। “
क्योंकि सोचने पर समझ में आता है….
कि सफलता कोई मंज़िल नहीं,
वह तो एक मन की अवस्था है।
वह मिलती है जब हृदय शांत होता है,
जब चेहरे पर मुस्कान हो,
और जब आत्मा को अपने होने पर गर्व होता है।
यक़ीनन, जिस दिन मनुष्य सुकून को पा लेता है,
उसी दिन सफलता नाम की मंज़िल उसकी तलाश में चल पड़ती है।
फिर राहें कठिन नहीं लगतीं,
कदम थकान नहीं महसूस करते,
और चेहरा…एक अनजानी, पर गहरी मुस्कान से खिल उठता है।
यदि सफलता आपसे दूर भागती है
तो यक़ीनन आप सुकून कही भूल चुके हो
और
जहां सुकून नहीं वहां आत्मविश्वासभरी मुस्कान नहीं…
जब भीतर की शांति जागती है,
तो बाहर की दुनिया स्वयं रास्ता बनाती है।
सुकून ऐसा दीपक है, जो मंज़िलों को उजाला देता है;
और इंसान, जाने-अनजाने उस रोशनी की ओर बढ़ता चला जाता है…
बिल्कुल उसी दिशा में, जहाँ उसका मन पहुँचने की आकांक्षा रखता है . . . . . . . . . . . . .
13-16.11.2025
