29. ” कुल्हड़ वाली चाय “
(…..आगे…..)
आज रात फिर roof-top call पे
महफिल कॉफी की जम रही है,
जायका कॉफी का फिर से दुगना हो रहा है…
जब जब बात होती है चाय की
याद तुम आती हो,
प्याली चाय की दिखते ही
कुल्हड़ के साथ तुम दीखती हो,
थंड भरी बरसात मे तुम्हारा साथ होता था,
जैसे भीगे सावन में मन भी झूम उठता था,
पकोड़ों के साथ तुम और मैं बतियाते थे,
आंखो ही आंखो में एक-दूसरे के खो जाते थे,
बरसात के शाम में महफिल चाय की सजती थी,
थकान भरे मन को फिर स्वर संगीत तुम सुनाती थी ,
मैने भी है लायी अब कुल्हड़ सी प्याली,
यहां न है कुल्हड़ और न है चाय कुल्हड़वाली,
कभी कभी जब आती है चाय मेरे सामने,
कहती है मुझसे वो कुल्हड़ और तेरे मेरे अफसाने,
चीनी प्याली के साथ है यहां कॉफी कोल्ड वाली,
बिना कुल्हड़ के भी सुहाती ये फ्लेवर प्रीत वाली,
बारिश की इस भीगी मिट्टी में
आज फिर वही खुशबू है,
हमारे मिलने के इंतजार में
देखो कुल्हड़ मे यहां भी कॉफी जायकेदार है….
कभी तो खत्म होगा ये इंतजार तेरा मेरा,
कुलहड़ वाली चाय के साथ होगा फिर सुनहरा सबेरा….
