२५. ” फिरसे मिलना “
(…..आगे…..)
समय के साथ दोनो की बाते होती रहती थी,
मिलना थोड़ा मुश्किल था,
लेकीन मिलने का इंतजार रहता था,
बढ़ते इंतजार के साथ शोर में भी सन्नाटा लगता था..
दूरियां मिटाते मेसेज में कभी आंसू झलक उठता था,
याद में कभी अज्ञातवास को ओर कदम बढ़ता था….
एक कदम अज्ञातवास की ओर,
शायद वहां सुनाई देगा मुझे मेरे अंदर का शोर,
कोई बुला रहा है मुझे मेरेही ओर…
सुकूनभरी उस दुनिया में,
होगा थोड़ासा गुमनामी का अंधेरा,
किरण वही से निकलेगी जहां होगा सबेरा सुनहरा,
लौट के फिर आऊंगा मैं,
जब आवाज तुम्हारी आयेगी,
पहचान तुम्हारी मेरी फिर पुरानी लौट आयेगी…
कुदरत के इस खेल में भी,
धागा अपना सच्चा है,
बिछड़े अगर कभी,
फिरसे मिलना पक्का है….
– सुश्या
( कविता मालिका ” ‘नेत्रा’ और ‘पत्र’ “
……भाग-३, समाप्त )
