८. “C.C.D. की ओर…”
(…..आगे…..)
दिन जैसे युगों की करवट ले गया,
सांझ में कोयल ने मधुर स्वर बहाया,
क्षितिज पे सोने सा प्रकाश छा गया,
दोनों के गालों पे शरम की लाली मुस्काई साया।
सपनों की कविता में बीता दिन उनका,
विरह की घड़ियाँ अब कटती न थीं,
मिलन की वह घड़ी अब पास थी उनकी,
“सी.सी.डी.” की ओर सवारी चली थीं।
धड़कनों की जैसे थीं रफ्तार,
काँपते होंठों पे चुप की कहानी,
मुस्कान भी बढ़ रही थीं हर कदम पर,
नज़रों में फिर भी चलती रवानी।
दोनों की कहानी, जो कल तक थी अधूरी,
“सी.सी.डी.” में शायद हो जाएं पूरी….
