8. ” जायका जिंदगी का “
(……आगे…..)
धागा दोस्ती का पक्का था,
मोबाइल पे जो रोज सजता था..
सूबह, शाम हो या रात,
कॉफी की अलग ही है बात,
महफिल बस हमारी और उनकी
साथ में कॉफी के जायके की,
बातें वो हमसे बढ़िया बनाती थी,
कल, आज और कल की सैर नयी कराती थी,
हसीं उनकी खिलती थी,
कयामत नयी आती थी,
हर शाम सुनहरी लगती थी,
कहानी प्यार की बनती थी,
आज भी जो चांद निकल आता है,
जायका कॉफी का दूरियां मिटाता है,
जब चांद सर पे दिखता है,
हर बात सुहानी लगती है,
कॉफी पे कॉफी होती है,
वही बात शुरू होती है,
अखियों के झरोखों से जो तीर उनका चलता है,
घायल हमे कर हंसना उनका खिलता है,
धरती का ये चांद देख चांदनी भी मुस्कुराती है,
दुनिया के सारे रंग कुदरत यहां खिलाती है,
इस कॉफी के जायके में बात ही कुछ अलग होती है,
जनम जनम की सैर पल भर में वो कराती है,
हवा के झोंके से बाल जो उनके लहराते है,
जिंदगी का जायका भी महसूस वहीं होता है,
आखों ही आखों में जब इशारे हलके से होते है,
आसमान के नींचे एक नई कहानी बनती है….
– सुश्या
