४. ” प्रीत की कली “
(….आगे….)
प्रीत की कली जैसे अभी-अभी खिली,
गालों पर डिम्पल उसके मनमोहक और चुलबुली।
दिल में जैसे बजा कोई सितार,
दिमाग में महसूस हुआ कोई अदृश्य प्रहार।
कागज़ वो पत्र का जो था मुझे मिला हुआ,
कैसे कहूँ, उसे मैंने न था लिखा हुआ…
४. ” प्रीत की कली “
(….आगे….)
प्रीत की कली जैसे अभी-अभी खिली,
गालों पर डिम्पल उसके मनमोहक और चुलबुली।
दिल में जैसे बजा कोई सितार,
दिमाग में महसूस हुआ कोई अदृश्य प्रहार।
कागज़ वो पत्र का जो था मुझे मिला हुआ,
कैसे कहूँ, उसे मैंने न था लिखा हुआ…