7. ” चलो चलते है “
(……आगे…..)
मिलना दोनो का कम हुआ,
न मिलने का गम हुआ,
चलो चलते है फिर से ऊसी जगह,
जहां तुम थी, मैं था और कुछ अजनबी थे,
क्या तुम्हे याद है, उस तूफानी बारिश में पर्वत हम चढ़े थे,
उस छोटे पर्वत की ऊंची चोटी पर,
महसूस कर रहे थे हम अपने आप को आसमां के ऊपर,
तन मन भीगा हुआ था,
तुम कपकपा रही थी,
सांसे हमारी तेज चल रही थी,
हवा के झौके ने तुम्हे हिला दिया था,
आखों के सामने तुम्हारे अंधेरा छा रहा था,
ना तुम उतर रही थी, ना मुझे उतरने दे रही थी,
शाम भी अब चुपके चुपके ढलने जा रही थी,
बारिश ने भी अब जरा छुट्टी ले रखी थी,
धीरे से तुम्हे अब मैंने उठा लिया था,
हाथों ने जब तुम्हारे एक दूसरे को थाम लिया था,
देख निचे फिर भी दिल घबरा रहा था,
आहिस्ता आहिस्ता डर खोने लगा था,
आते ही नीचे दोस्त सब इंतजार कर रहे थे,
कुल्हड़ वाली चाय के साथ सब छेड़ रहे थे….
– सुश्या
