२५. पत्र
(…..आगे…..)
किसीका तो आया था सी सुशी को एक पत्र,
बतलाया उसने सबको वो सहेली का है मात्र,
पढ़कर जो उसके गाल हुवे गुलाबी,
चुपके से हुए उसकी आंखे शराबी,
रोक ना सकी वो उसकी मुस्कान शर्मीली,
जान ली सबने उसकी नजर नशीली,
गाकर मन में ही झूम उठी वो गगन मे,
मचल रही थी खुशी उसकी ७ वें आसमान में,
ढल रही शाम में वो बालकनी में चली गई,
होठों पे सुरों की जैसे महफिल ही सज गई,
संदेश में उससे मिलने का समय जो आया है,
गुलाबी ये कोयल नाचते हुए जो गाती है…..
(काव्य मालिका – ” ‘नेत्रा’ और ‘पत्र्’
……… भाग – १ , समाप्त)
