२३. ” दिखाई देना बंद हो गई “
(…..आगे…..)
परीक्षा के समय में बातें कम हो गईं,
रातों की छत अब लाइब्रेरी में बदल गई,
यादों के मेले में मन था भटकता,
दिन कॉलेज का, रातें पढ़ाई से सजी रहतीं,
call पर सुशी से बातों में दिल बहलता,
छोटी-सी Break में खुद से बातें करती,
” एक घंटे का वक़्त था तुम्हारे पास बस,
अब तो मिलने का भी समय खत्म हुआ सब,
कैसे बुझाऊं सुशी के गुस्से की अग्नि,
मैं मौन… और उसके दिल की पीड़ा अग्नि…
पास आते-आते कदम ठिठक गए,
जैसे हमें कोई अदृश्य बंधन से रोके गए,
सहजी से बोलने वाली दोस्त अचानक खामोश हो गयी,
कॉफी की प्याली भी अब दिखना बंद हो गयी…”
– सुश्या
उधर सुशी की हालत भी कुछ अलग नहीं थी,
किताबें सामने और खुद से बातें हो रही थी…
“आँखें बंद करूँ तो मन में जलन उठती,
पलकों पर भी बस तुम्हारे सपने देखती,
इस पागल दिल को बस तुम्हारी ही चाहत थी,
जीने के लिए तुम्हारी एक झलक ही काफी थी,
शांत मन में अब तूफ़ान गूंज उठा,
शब्द भी असमर्थ उस बवंडर को बाँधने में,
रोज़ किस्मत का चलता कोई अनोखा खेल,
क्या कभी भावनाओं और सपनों का होगा मेल?
स्वतंत्र मेरा अस्तित्व भी तुम्हारी ही जादू थी,
मिले नए आकाश में स्वयं को खो देती थी,
मन अब इस अस्तित्व को सार्थक बना है,
क्षितिज के पार जाकर फिर तुम्हें खोजना है…”
– सुशी
जल्द ही बीत जाएंगे ये परीक्षा के दिन,
सावन में फिर से बरसेगा सपनों का मधुर रस..
