२१. ” प्राजक्त खिल उठा “
(…..आगे…..)
सुशी को आज मानो स्वर्ग मिल गया,
उसके सपनों में प्राजक्त भी खिल गया,
धीरे-धीरे बरस रहा था सावन,
काँप रहे थे सपनों के आँगन।
भीगी सुशी और भीगे उसके बाल,
सुश्या बोला हँसी छलकते,
“एक प्याली गरम कॉफी मिले,
तो थकन उतर चले।”
देवराई में अब अंधेरा छा गया,
बाहरी क्षितिज पर स्वर्णिम सूर्य झिलमिला गया,
धीरे-धीरे नीचे जाता ओझल हो गया।
धीरे-धीरे अब दोनों भी नीचे उतर आये,
ठिठुरन से अब वे सिहर आये।
फिर सैंडविच की महक बसी,
कॉफी के प्यालों से बातें हुईं,
मित्रों ने फिर जश्न मनाया,
बारिश ने गीत सुनाया।
थक कर सब घर लौट चले,
मीठे पल संग दिल में भरे,
सुशी और सुश्या ने मुस्काते,
नर्म विदा के स्वर में बंधते।
