22. ” रंग तेरी प्रीत का “
(…..आगे…..)
बातों ही बातों में ‘सुशी’ भी अब बोल पड़ी,
क्या समझ पाएगा ‘सुश्या’ उसकी ये मुश्किल घड़ी.
प्रीत इन नयनों की, सच में क्या तू समझता है ?
क्या स्पर्श मेरा तुम्हारें दिल तक पहुँचता है?
अनजाने में क्यों ये साँसें तेज हो गईं?
क्यों मेरे दिल में इस कदर धड़कने लग रहीं?
क्यों तूने मुझे इस तरह पागल बना डाला?
क्यों मुझसे ही चुपके से मुझे ऐसे चुरा डाला?
पागल हुआ मन इस तेरे-मेरे नशे में,
खो बैठी खुद को भी मैं, इस सारी दुनिया में।
प्रेम की इस नदी में यूँ ही दोनों भीगते रहें,
हर दिन नया प्रेम गीत हम साथ गाते रहें।
ढलते सूरज की टीस दिल को छू जाती है,
यह संध्या बेला भी मन को खूब भाती है।
ढलते सूरज में ही तू पलकों पर झलकता है,
तुझे देखते ही अनजाने में मैं भी शरमा जाती हूँ।
तेरी जुदाई अब इस दिल को सही नहीं जाती,
तेरे बिछड़ने में अब मुझसे जिया नहीं जाता।
दिल में तेरे सिर्फ मैं ही क़ैद हो जाऊँ,
तेरी साँसों में मैं ही सदा बस जाऊँ।
हर रोज़ यूँ ही नया मिलन मन का होता है,
तेरे-मेरे संग से यह खुशियों का वन सजता है।
कोमल इस दिल को तेरे शब्दों का स्पर्श भाता है,
मेरी आँखों में अब सिर्फ़ तेरी प्रीत का रंग नज़र आता है।
– सुशी
