२०. ” जायका चाय का “
(…..आगे…..)
काँपती हुई सुशी को हिचकियों ने शर्मिंदा कर दिया,
भीगी हुई सुशी को देखकर काव्य सुश्या को सूझा।
” आखरी बारिश की पहली बुंद,
तेरे साथ ये जायका चाय का और ये अलग सी धुंध,
मुस्कुराती हुई घटाओ के ठहाकों की गूंज,
और तेरे पास आने से शरमाती ये लताकुंज,
चुपके से हमारा यूं आंख मिचौली खेलना,
भीगी जुल्फों का यूं हवा में लहराना,
बारिश के साथ इन धड़कनों का महसूस होना,
मुस्कराहट के साथ ऐसे इनका तेज होना,
आखों ही आखों में ऐसे एक दूसरे में खोना,
कुल्हड़ वाली चाय से इन दुरियो का मिटना,
दो दिल एक धड़कन, एक सास हो रहे,
देखते ही देखते किसी बंधन में हम बंध गए… “
– सुश्या
