१९. ” देववन “
(…..आगे…..)
दिन दर दिन यूँ ही अनजाने गुजरते रहे,
एक दिन सभी मित्र देववन में घूमने गए।
सामने आए, फिर न बोले, चुपचाप दिल की बातें ढोते,
दोनों के मौन के साए में सब चले लौटते।
देववन में कुल्हड़ चाय की खुशबू थी,
भजिया गरमा गरम, सैंडविच की धुन थी।
चलते चलते दोनों के हाथों में चाय का प्याला,
कभी एक-दूजे को देखा, कभी हरियाली का उजाला।
अचानक, आसमान ने संदेशा भेजा,
रोहिणी की फुहारों ने उन्हें भिगो दिया।
दौड़ते हुए दोनों देववन की लताओं में छिप गए,
आकाश भी सावन की घटाओं से घिर आया।
आगे जो हुआ लिखा था किस्मत की रेखाओं में,
वो पल उतर आया था उनकी आँखों में…
