१८. सपनों की दुनियां में
(…..आगे…..)
उड़ गई अब सुश्या की नींद,
बैठा गया गुमसुम सा कर आंखे बंद,
सपनों की दुनियां में खो रहा था,
खुद से ही शायद कुछ बोल रहा था,
“पलकों में मेरी क्यों मुझे वो दिखती है,
धीरे से देख मुझे क्यों वो शरमाती है….
ऐसे ही खीले ये साज-सिंगार उसका,
जिसमे अटक जाता है सांस मेरा….”
