22. ” एक दिन “
(…..आगे…..)
‘सुशी’ को मनाना मुश्किल न था,
बस उसके एक हसीं का इंतजार था…
चलो कल कही चलते है,
एक दिन हमारा बनाते है,
सूरज की पहली किरण तुम्हे जब छुएगी,
सामने तुम्हारे वहा मुझे पाओगी,
निकल पड़ेंगे हम उसी किरण की ओर,
जब हो रही होगी दुनिया में भोर,
किसी पास के हिल स्टेशन पे,
या फिर किसी समंदर पे,
या जहां तुम कहोगी वहा पे,
लेकिन ना खायेंगे unhygienic गोलगप्पे,
हसीन वादियां, काली घटाएं और होगा घना जंगल,
बुनेंगे तुम और मैं यादों के वहा सुनहरे पल,
चलो, एक दिन हमारा बनाते है,
यादों का पिटारा सजाते है,
चलो चलते है कही दूर,
जहां तुम भुला दो मेरा कसूर…
– सुश्या
आवाज ‘सुश्या’ की सुनकर
देखो ‘सुशी’ पिघल गयी,
मिठी डांट भी ‘सुशी’ की ‘सुश्या’ का दिल छू गयी,
तुम कभी ना आओगे,
चलो मैं ही उड़कर आती हूं,
पंछी बन मैं आंगन में तुम्हारे कल सुबह उतरती हूं…
– सुशी
