१७. नया रंग
(…..आगे…..)
” आवश्यकता नहीं उसे “
मन में ही मन में था वो बुदबुदाता,
गुस्से से कभी मासूमियत से देखता,
मंगाई सुशी ने कॉफी with vanilla choco ice,
जैसे सुश्या के गुस्से पे डाला हो spice,
सुश्या को दिखा वो गरीब और भोला,
जो खा रही थी सुशी ice का गोला,
जाते जाते सुशी की ओर
धीरे से शरमाया,
होठों पे जातेही उसके
पल में जो पिघल गया,
चखने से ice हुई वो हैरानी से दंग,
चढ़ रहा जैसे ice पे भी सुशी का ही रंग,
देख ऐसे सुशी को
उड़ गई सुश्या की नींद,
क्या कर दिए सुशी ने दरवाजे दिल के बंद ?
बेकार लगी सुश्या को सारी उसकी कोशिश,
कही न दिख रही थी प्यारी सुशी की कशिश….
