१७. ” तेरे बिन “
(…..आगे…..)
बातों-बातों में कॉलेज का वक्त आ गया,
हड़बड़ी में दोनों ने नाश्ते के बाद फिर एक प्याली कॉफी संग जिया,
भारी मन से दोनों चल पड़े अपने रास्ते,
जाते हुए लेकिन सुशी ने उसे drop किया आहिस्ते,
सपनों-से उस पल को दोनों ने संजोया,
फिर मिलने के वादों से दिलों को थोड़ा और भिगोया,
सुशी ने तो आज कॉलेज से छुट्टी ली,
सिर्फ सुश्या के लिए पकाया पुलाव खयाली,
उसके पागल मन को फिर कविता सूझी,
बारिश की बौछारों के साथ उसने वह गुनगुनाई…
” क्यों पागल सा हुआ है यह मन,
किसी के लिए क्यों तड़प रहा है यह मन,
क्या करूँ तुझे अर्पित,
ताकि समझ सके तू मेरा समर्पण,
लिखती हूँ तुझको मन की डायरी में,
क्या तू कभी पढ़ेगा, किसी संजीवनी-से दिन में,
कल मिली थी तुझसे सजीव साक्षात्कार में,
पर शब्द गुम हो गए थे मेरे एक ही साँस में,
कह देती अगर, ‘तू है मुझे भाता,
तो शायद वह पल तुझको रास न आता,
क्या कहूँ इसे – प्रेम या केवल आकर्षण,
पर बसा है दिल में तेरा मौन मुस्कान,
आँखों में बसता है तेरा मुस्कुराता चेहरा,
तेरे बिना बेरंग, सूना, यह मेरा जहाँ सारा …”
– सुशी
