१६. ” अनकही बातें “
(…..आगे…..)
कॉफी शॉप की खामोशी हल्की-हल्की सर्द हवा की,
सामने टेबल पर उठती भाप कॉफी की,
जैसे दो दिलों के बीच परछाइयाँ अनकहे जज़्बातों की।
सुश्या ने पूछा सुशी से,
“कहना है क्या कुछ तुम्हें मुझसे?”
सुनते ही लजा उठीं सुशी…
सुशी चुपचाप बनी सी थी,
उसके स्वर में नमी सी थी,
झुकी थी पलकें नयनाभिराम ,
गालों पे रंग था, होंठों पे मुस्कान।
” नहीं… कुछ कहना नहीं है,
तुम्हें सुनने के लिए ही देख रही राह मैं…”
सुन कर यह,
सुश्या का दिल जोर से धड़कने लगा,
दिमाग में हलचल और शब्द अटकने लगा।
वो लम्हा ठहरा, हवा भी थमी,
कॉफी भी कुछ आज नयी सी थी,
नज़रों ने जो कहा, वो लफ्ज़ न थे,
पर हर खामोशी बहुत ग़ज़ब की थी।
कभी-कभी…शब्द भी बेबस हो जाते हैं,
उस शाम, कॉफी के कप खत्म हुए, हँसी चलती रही,
लेकिन “अनकही” बातें, फिर भी वहीं ठहर रही…
