17. ” आंसू “
(…..आगे…..)
अचानक एक रात ‘सुश्या’ ने अपना पुराना mail inbox ओपन किया,
देख ‘सुशी’ के खत उसकी खुशी का ठिकाना न रहा.
मन ही मन में अपने आप को बहुत बुरा उसने कहा,
क्यों न पहले ये inbox मैने ओपन किया?
नंबर ‘सुशी’ का ले कर उसने पहले वो डायल किया,
सो रही शांत ‘सुशी’ को सोच कर झट से call cut किया,
सुबह के इंतजार में ‘सुश्या’ ने कई मेसेज किए….
मेसेज १
सपनों भरी आंखो से एक आंसू छलक उठा…
वक्त के सैलाब् मे जाने क्या क्या बह गया,
कट गया कितना सफर और कितना बाकी रह गया…
अपनी अपनी मंजिले है,
अपने अपने रास्ते,
कोई आगे बढ गया तो कोई पीछे रह गया…
हाय !
वो क्या दौर था !
कितना हसिन् था वो समा !
हाथ से जब तुम्हारा हाथ छुठा,
साथ क्या रह गया ???
दर्द से दिलं ने मेरे,
हर दिन हंस कर ये कहा –
” ऐ दर्द!
तु क्या दर्द है,
तुझको तो मै सह गया ! “
सपनों भरी आंखो से फिर एक आंसू छलक उठा…..
– सुश्या
