समर्पण
” तुम एक तारा हो,
कई आँखों की उम्मीद की किरण हो,
केवल जन्मदाताओं की नहीं, कई माताओं की तुम माता हो,
नियति के विधान और काँटों भरी राहों में मुस्कान के साथ चलने वाली तुम आदि-शक्ति हो…”
एक सांझ के समय, कॉफी पीते हुए अचानक एक संदेश आया…
शायद वो संदेश उसी समय पढ़ा गया, जब मैं कॉफी के घूँट ले रहा था, एक पल को लगा कि जैसे वह संदेश अनजाने में मुझे भेजा गया हो।
क्योंकि जनसेवा को समर्पित वह हमेशा दौड़ती रहने वाली ट्रेन उस क्षण थमती हुई सी लगी…
और उस ट्रेन को पलभर रोकने वाला forwarded लेख वही था :
” जागना उसके जीवन का स्थायी भाव बन चुका था। डॉक्टरी पेशा स्वीकारते ही उसने एक ऐसे जीवन में प्रवेश किया था, जिसमें कोई निश्चित समय-सारणी नहीं थी। अपने शरीर की चिंता करने का उसमें कोई स्थान नहीं था। लेकिन शरीर तो आखिर शरीर ही होता है!
प्रकृति कभी क्षमा नहीं करती। जो सहस्त्र अपराध क्षमा करने वाले कृष्ण से भी अधिक सहिष्णु है, प्रकृति उससे भी कहीं अधिक शक्तिशाली है। फिर भी, वह एक चेतावनी ज़रूर छोड़ देती है। प्रेरणा ने इसे कभी नकारा नहीं।
डॉक्टरी सेवा के कारण उसने मानव शरीर की सीमाओं को जाना था, लेकिन साथ ही जब इन सीमाओं को इच्छाशक्ति का स्पर्श मिलता है, तो वही शरीर पंचमहाभूतों को चुनौती देने जितना सक्षम बन जाता है, यह भी वह जानती थी।”
– लेखक :- व. पु. काळे “
वास्तव में, उसका ही प्रतिबिंब इस लेख में दिखा…
दाहिने हाथ में पकड़ा coffee cup टेबल पर रखा गया, और मेरी उंगलियाँ अनायास ही Mobile keypad पर चलने लगीं…
“डॉक्टर” सिर्फ एक उपाधि नहीं है, यह एक ज़िम्मेदारी है। असल में, चिकित्सा पेशा एक समर्पण है, एक उद्देश्य है। जिस क्षण कोई विद्यार्थी “डॉक्टर” बनने का निर्णय लेता है, उसी क्षण से उसके जीवन का हर क्षण दूसरों के लिए समर्पित हो जाता है। उसका दिन आरंभ होता है रोगियों की पीड़ा से और समाप्त होता है उनके उपचार की संतुष्टि के साथ।
डॉक्टर केवल पेशेवर नहीं होते, वे किसी के लिए फरिश्ता होते हैं। किसी माँ की नम आँखों में राहत की चमक होते हैं, किसी पिता के काँपते हाथों को थामने का सहारा होते हैं, किसी छोटे से जीवन की मुस्कान के पीछे का कारण होते हैं। और जब वे अपने रोगी को स्वस्थ देखते हैं, तो उनके चेहरे पर जो संतोष की मुस्कान आती है, जिसकी तुलना शायद किसी पुरस्कार से नहीं कर सकते।
डॉक्टर बनना तपस्या है। चिकित्सा शिक्षा का लंबा सफर, नींद की अनगिनत कुर्बानियाँ, कभी न खत्म होने वाली पढ़ाई का बोझ, और फिर दिन-रात की सेवा की ज़िम्मेदारी यह सब, जो विधाता ने उन्हें दिया हुआ सबसे बड़ा पुरस्कार होता है।
हर दिन डॉक्टर के लिए अलग होता है। कुछ दिन होते हैं ख़ुशी के, जब कोई जटिल ऑपरेशन सफल हो जाता है, या नवजात शिशु की पहली रुलाई सुनाई देती है, या कोई मरणासन्न रोगी कैंसर से लड़कर नई उम्मीद के साथ जीने को तैयार होता है, ऐसे क्षणों में थकान क्षणिक बन जाती है, और जो शेष रहता है, वह होता है आत्मसंतोष।
पर कुछ दिन ऐसे भी होते हैं, जब तमाम प्रयासों के बावजूद कोई रोगी बचाया नहीं जा सकता। उस पीड़ा में डॉक्टर का मन भी मौन हो जाता है।
हर डॉक्टर रोगियों की पीड़ा महसूस करता है, फिर भी वे अपने भावनाओं पर नियंत्रण रखते हैं। मुस्कान के साथ वे रोगी के जीवन में आशा की किरण जगाते हैं।
वह यह भली-भांति जानती है कि डॉक्टर के चेहरे की एक झलक भी रोगी के मनोबल को प्रभावित कर सकती है। इसलिए डॉक्टर हर शब्द, हर निर्णय को अत्यंत संयम से लेते हैं।
मुझे लगता है, कोई संयोग से डॉक्टर नहीं बनता। कई प्रतियोगिताओं में तपकर, भीड़ से निकलकर नियति स्वयं इस पवित्र सेवा के लिए किसी पवित्र आत्मा का चयन करती है। इसलिए डॉक्टर में लोग भगवान का रूप देखते हैं।
यह यात्रा पूर्व निर्धारित होती है, कभी सरल, कभी कठिन, कभी थकाने वाली, लेकिन अंततः संतोषदायक होती है, क्योंकि यह सिर्फ व्यक्तिगत यात्रा नहीं होती, बल्कि यह हज़ारों-लाखों जीवनों से जुड़ी होती है। रोगियों का सफर सुखमय बनाने के लिए ही नियति उस भरोसेमंद और स्नेही आत्मा का चुनाव करती है, और डॉक्टर का हर क़दम इसी कर्तव्यपूर्ति की ओर होता है।
किसी के लिए या कहीं के लिए इस तरह जीवन समर्पित करना, इससे अधिक गर्व की बात और क्या हो सकती है?
जब हम इस समर्पण को स्वीकार करते हैं और समझते हैं कि ईश्वर ने हमें इसी कार्य के लिए धरती पर भेजा है, और हम उसी कर्म में लगे होते हैं…तो थकान केवल एक कल्पना बन जाती है, और शेष रह जाता है उत्साह…और उससे भी अधिक, आगे बढ़ने की आत्म-प्रेरणा।
हाँ, डॉक्टर को भी थकान होती है! शरीर थकता है, मन कभी निराश होता है। कभी-कभी उन्हें भी लगता होगा कि सब कुछ छोड़ दें।
लेकिन तभी कोई आ जाता है… कभी कोई वृद्ध माता-पिता आशीर्वाद देते हैं, कभी कोई बच्चा पहली बार डॉक्टर को मुस्कराकर देखता है, तो कभी कोई रोगी कहता है, “शुक्रिया डॉक्टर!” और इन दो शब्दों से सारी थकान पलभर में मिट जाती है।
डॉक्टर होना सिर्फ एक पेशा नहीं है, यह एक जीवनशैली है। यह 9 से 5 की नौकरी नहीं, एक ज़िम्मेदारी है जो जीवनभर साथ चलती है।
छुट्टी के दिन भी किसी की जान उन पर निर्भर हो सकती है। कभी भी फोन आ सकता है, कभी भी अस्पताल दौड़ना पड़ सकता है। और फिर भी यह यात्रा सुखद होती है, क्योंकि डॉक्टर अपने सुख के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन को दिशा देने के लिए होते हैं।
डॉक्टर होना सिर्फ अस्पताल में काम करना नहीं, बल्कि एक आशा का प्रकाश होना है। यह एक ऐसी यात्रा है जिसमें अपने साथ दूसरों की भलाई भी होती है। यह रास्ता कठिन होता है, पर सुखद होता है। और हर यात्रा के अंत में रह जाती हैं यादें….कभी ख़ुशियों की, कभी आँसुओं की….जो फिर से आगे बढ़ने की प्रेरणा बनती हैं।
सब कुछ शायद नहीं, लेकिन हमारा गंतव्य निश्चित होता है…. इस पर मेरा विश्वास है। शायद यात्रा भी पहले से तय होती है….
पर अंत संतोषजनक और सार्थक होना चाहिए….इस पर मेरा विश्वास और भी गहरा है।
भले ही यात्रा तय हो, लेकिन उसमें आने वाले कुछ अप्रिय क्षणों को नजरअंदाज़ कर अगर कुछ अविस्मरणीय पलों का आनंद लिया जाए, तो यही यात्रा आनंददायक बन जाती है। फिर रास्ते में चाहे कितने भी उतार-चढ़ाव क्यों न हों, हमें मिलता है सिर्फ आनंद, और अंत में रह जाती हैं वे स्मृतियाँ….. जिन्हें याद करके फिर से उस आनंद में खो जाने को दिल करता है।
कभी-कभी जब मन थका, निराश या थोड़ी विश्रांति की खोज में होता है…. मन कितनाही मासूम और छूना हो, तब भी उसे फिर से सशक्त बनाने की ज़िम्मेदारी…. …..नहीं, यह योजना ही उस विधाता ने बनाई होती है…
……सिर्फ तुम्हारे लिए…
March. 2025
