शब्द
आज रात मेरी कलम न पढ़ना,
पढ़कर कोई सवाल न पूछना,
सवाल मैं जानता हूँ सबका,
जवाब मैं दे न पाऊंगा उसका।
इस रात मेरी कलम को सोने दो,
बिना सवाल, बिना जवाब, रहने दो,
आज शायद कोई शब्द न बोले,
कल शायद ये साँसें न डोले।
शब्द अब शांति चाहते हैं,
सांसें कुछ पल को विराम मांगती हैं,
मन कहता है, ” बस अब बहुत हुआ,
नींद की गोदी में हम खुद को सौंपते हैं। “
न कोई शिकवा, न कोई सवाल,
सिर्फ़ सुकून, एक मीठा ख़याल,
सवालों में छुपे हैं शब्दों के अफ़साने,
जवाबों में छुपे हैं बस वीराने।
शब्द भी अब थक से गए हैं,
ज़िंदगी के सफर से हट से गए हैं,
ये पंक्तियाँ कुछ कहती हैं तुमसे,
पर उन्हें आवाज़ न देना तुम वैसे।
जो शब्द दिल से निकले थे चुपचाप,
कभी खामोशी में छिपे थे बेहिसाब,
अब पन्नों पर बहते हैं कुछ बिखरे से संग,
हर अक्षर में बसी है कोई दबी सी तरंग।
हर चेहरा पढ़ चुका हूँ अब तक,
हर मुस्कान के पीछे देखा है अलग,
जो लिखा नहीं, वहीं शब्दों के पीछे है,
मन पढ़ने में हम आज भी कच्चे है।
चलते हैं अब,
हम सोने जा रहे हैं,
फरिश्ता मुस्कुराता है दूर क्षितिज से,
शब्द भी उस ओर चुपचाप बढ़े जा रहे हैं।
चाँदनी ओढ़कर,
तारों की छांव में,
सपनों की बाँहों में खोते हुए,
एक नई दुनिया की ओर हम भी चले जा रहे हैं।
26.07.2025
Good Night…
