वेदना
आज व्हॉट्सॲप पर एक लेख पढ़ने को मिला, जिसमें लेखक ने वेदना पर अत्यंत गहन विचार प्रस्तुत किए थे—
“वेदना एक अस्तित्व लेकर जन्म लेती है और किसी न किसी के माध्यम से अपना जीवन जीती है। इसकी तुलना आत्मा से की गई थी—अमूर्त, अविनाशी, और अनंत।”
वास्तव में, कितना गहन और अर्थपूर्ण विचार है यह। यह लेख सोचने पर मजबूर कर देता है। कुछ समय विचार करने के बाद मन में कई विचार आए, और अनायास ही उन्हें शब्दों में ढाल दिया।
शायद ऐसा ही होता होगा, क्योंकि किसी व्यक्ति की वेदना हमें कहीं न कहीं और किसी अन्य रूप में दिखाई देती है। भले ही वह व्यक्ति हमारे सामने न हो, लेकिन उसकी वही वेदना हमें किसी और में दिखाई दे जाती है।
वास्तव में, यदि विचार करें तो महसूस होता है कि वेदना किसी न किसी कारण से हमारे जीवन में आती है। कुछ वेदनाएँ अस्थायी होती हैं, तो कुछ जीवनभर साथ निभाती हैं। किसी व्यक्ति की वेदना यदि उससे विदा भी हो जाए, तो भी वह कहीं और, किसी अन्य हृदय में पुनः जन्म लेती है। मानो वेदना का भी पुनर्जन्म होता है।
हर व्यक्ति अपने जीवन में वेदना का अनुभव करता है, लेकिन वह उस पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देता है, यह उसके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। कुछ लोगों को वेदना कमजोर बना देती है, तो कुछ को और अधिक मजबूत। इतिहास गवाह है कि कई महान व्यक्तित्वों को गहरी वेदनाएँ मिलीं, और उन्हीं वेदनाओं ने उनके जीवन को आकार दिया।
जिस प्रकार एक हीरा बनने के लिए अत्यधिक दबाव, ताप और समय की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार वेदना भी व्यक्ति को गढ़ती है, उसे सशक्त बनाती है, और उसके अंतर्मन को शुद्ध करती है।
जैसे-जैसे हम जीवन में आगे बढ़ते हैं, वेदनाओं का स्वरूप भी बदलता रहता है। कुछ वेदनाएँ समय के साथ फीकी पड़ जाती हैं, तो कुछ मन के कोने में सदा के लिए घर कर लेती हैं। लेकिन ये वेदनाएँ हमारे विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को एक नई दिशा देती हैं।
जिस प्रकार शरीर को किसी रोग से मुक्त करने के लिए औषधि की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मन को भी वेदना की आवश्यकता होती है। वेदना हमारे भीतर की विषाक्त भावनाओं को बाहर निकालती है, हमें अधिक संवेदनशील बनाती है, और दूसरों की वेदना को समझने की क्षमता विकसित करती है। (हालाँकि, कभी-कभी अत्यधिक वेदना मन को दूषित और द्वेषपूर्ण भी बना सकती है।)
परंतु जिस प्रकार एक औषधि शरीर से विषैले तत्वों को निकालकर उसे स्वस्थ बनाती है, उसी प्रकार वेदना भी हमारे मन से नकारात्मकता को हटाकर हमें दूसरों की पीड़ा समझने योग्य बनाती है। धीरे-धीरे वेदना का प्रभाव कम होता जाता है, और अंततः वह समाप्त हो जाती है, लेकिन तब तक हमारा हृदय दूसरों के दुखों को समझने में सक्षम हो जाता है।
पूर्व समय में लोग एक-दूसरे की वेदना को समझते थे, लेकिन आज हर कोई अपनी ही वेदनाओं में इतना उलझा हुआ है कि दूसरों के कष्टों की ओर ध्यान ही नहीं जाता। कभी वेदना के कारण लोगों के आपसी संबंध अधिक मजबूत होते थे, लेकिन अब स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और अहंकार ने इन संबंधों को ढँक दिया है।
यही सबसे बड़ी वेदना है—मनुष्य ने अपनी वेदना को इतना बड़ा बना लिया है कि अब वह दूसरों की वेदना को महसूस करने में असमर्थ हो गया है।
लेकिन वेदना केवल दुख देने वाली नहीं होती, बल्कि वह प्रेरणा भी दे सकती है। अनेक महान लेखक, कवि, विचारक, और कलाकारों ने अपनी वेदना से ही अद्भुत साहित्य, संगीत, और कला का सृजन किया है। वेदना व्यक्ति को गहराई से सोचने पर मजबूर करती है, उसके जीवन-दृष्टिकोण को बदल देती है, और उसे बेहतर जीवन जीने की सीख देती है।
वेदना को टाला नहीं जा सकता, लेकिन उसे स्वीकार किया जा सकता है। जब हम वेदना को अपनाते हैं, तो वह हमें अधिक जागरूक, अधिक दयालु, और अधिक परिपक्व बनाती है। वेदना से भागने की बजाय, यदि हम उसे आत्मसात कर लें, तो वही वेदना हमें नया दृष्टिकोण और सीख देती है।
वेदना जीवन का अविभाज्य हिस्सा है। वह आती है, चली जाती है, और हमें नया रूप देकर छोड़ती है। वह केवल पीड़ा नहीं देती, बल्कि जीवन का गहरा ज्ञान भी कराती है। लेकिन यदि हम अपने तक ही सीमित रहेंगे, तो वेदना केवल एक टीस बनकर रह जाएगी। पर यदि हम दूसरों की वेदना को भी समझने का प्रयास करें, तो यही वेदना हमें अधिक मानवीय बना सकती है।
कलियुग में भी यदि मनुष्य दूसरों की वेदना को समझ सके, तो यह संसार थोड़ा और सुंदर, थोड़ा और प्रेमपूर्ण, और थोड़ा अधिक मानवता से भरा हो सकता है।
30.03.2025
