“ये सफर है मेरा“
मत पूछो मुझे कि मैं कहाँ हूँ,
क्या कर रहा हूँ,
मत पूछो कहाँ जा रहा हूँ मैं,
शायद अपने आप को खोज रहा हूँ मैं।
भीड़ में खड़ा हूँ, मगर अकेला,
हर चेहरा है जाना-पहचाना सा,
फिर भी अंजाना सा।
हर राह दिखती है मंज़िल की तरह,
पर दिल की ज़मीन शायद कुछ ढूंढ रही है।
न शोर चाहिए, न सन्नाटा,
बस एक आवाज़ चाहिए…. मेरी अपनी।
जिसे सुनकर मैं कह सकूँ,
“हाँ, ये हूँ मैं… यही हूँ मैं।”
मत रोको मुझे, मत टोकना,
ये सफर है मेरा… मेरा ही बना रहे।
जो मिल गया रास्ते में, वो सौगात होगी,
जो खो गया, शायद वही सवालों का जवाब होगा।
10.03.2015
