मैत्रेयी
जैसे बादल और इंद्रधनुष्,
वैसी हो मित्रता हमारी,
क्षणिक खुशियों से दूर हो जाता है वह अहसास,
फिर से प्रकट होने की होती आस,
वैसी ही यह मित्रता है विशेष,
फिर से मिलने का होता है विश्वास,
जैसे इंद्रधनुष् के रंग से भर जाता है हर्ष,
वैसे ही हमारे मित्र का मन को स्पर्श,
बारिश में नहाते हुए सुखद होती छत्रियाँ,
अपने चेहरे पर मुस्कान होती है वह दोस्तीया,
सबसे गूढ़ है मित्रता का रहस्य,
देती है जीवन को हमेशा सुहास्य…
29.01.2006
