मेरा “मै” तेरा “तू”
गहरा समंदर मन के अंदर,
शांत सतह जिसमें उठते है बवंडर।
जीवन जैसे बन गया समर्पण,
तुम ही हर खुशी, हर लम्हा समर्पण।
भाग्य विधान हो सूरज हो तुम,
थकी मन की आशा किरण तुम।
नयन मूंदकर जब ध्यान लगाया,
हर दिशा में तुम्हारा ही रूप पाया।
तुम ही हो कर्म, मैं हूं पुजारी,
तुमसे ही मेरी आत्मा संवारी।
प्राणों में बसे जो मूक विचार,
वो सब हैं तुम्हारे ही उपहार।
जब भीतर उठी मौन की लहर,
मिल गया मुझको तेरा उत्तर।
ना शब्द, ना रूप, ना रंग रहा,
प्रेम आशीर्वाद का एक संग संग रहा।
मेरी हर हार में तुम्हारा प्रकाश,
मेरी हर जीत में तुम्हारा आभास।
अब ना चाह मुझे कोई संसार,
बस तुम ही तुम, बस तुम्हारा संचार।
तुम हो साधना, तुम ही हो गुरु,
तुझमे हो अंत और तुझसे ही शुरू।
तुम सरस्वती, तुम ही हो शारदा,
तुम ही लिखती सबकी जीवन गाथा।
ले ले मेरा “मैं”,
दे दे तेरा “तू”।
तुम ना मिली बाहर मंदिरों में,
पा गया तुम्हे अंतर्मन के शिवरों में।
28.06
