“मृगतृष्णा” : एक आभासी यात्रा
मृगतृष्णा का अर्थ है मृगजल या मरीचिका, जो एक प्रकार का वायुमंडलीय दृष्टिभ्रम है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें आपको दूर से पानी या जलाशय दिखाई देता है, लेकिन जब आप पास जाते हैं तो वह नहीं होता.
रेगिस्तान के विस्तृत और निर्जन मैदान पर जब सूरज की किरणें ज़मीन से टकराती हैं, दूर चमकता आकाश एक पानी की झील जैसा आभास देता है। यह दृश्य अद्भुत होते हुए भी एक भ्रम होता है, जिसे हम मृगतृष्णा के नाम से जानते हैं।
मृगतृष्णा वह स्थिति है जिसमें हमें पानी या कोई अन्य चीज़ दिखती है, पर वास्तव में वहां कुछ नहीं होता। यह भ्रम अक्सर रेगिस्तान में देखने को मिलता है, और सिर्फ जानवर ही नहीं, इंसान भी इस भ्रम में फंस जाते हैं।
मनुष्य का अंतर्मन भी कभी-कभी मृगतृष्णा जैसा ही होता है। हमारी आंतरिक भावनाएं, विचार और इच्छाएं हम पर ऐसा प्रभाव डालती हैं कि उस मृगतृष्णा के पीछे भागने के लिए, मंजिल को हासिल करने के लिए मजबूर हो जाते है।
मृगतृष्णा का यह सिद्धांत केवल प्रकृति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन के कई पहलुओं का प्रतिनिधित्व करता है। जीवन में भी कई बार हमें कुछ आकर्षक सपने या इच्छाएं ऐसी होती हैं जैसे वे मृगतृष्णा हैं। हम इन के पीछे भागते रहते हैं।
हमारे अंतर्मन का स्वरूप भी मृगतृष्णा की तरह हो सकता है। मनुष्य की यह प्रवृत्ति उसे भटकाने की शक्ति रखती है।
यदि हम अपने अंदर की आवाज़ को नहीं सुनते, तो हम इन मृगतृष्णा के जाल में फंस सकते हैं। लोग अक्सर दूसरों के लिए अपने कर्तव्यों में उलझ जाते हैं।
जीवन में सफलता के शिखर पर पहुंचना हर किसी का सपना होता है, लेकिन कई बार यह सपना भी मृगतृष्णा साबित हो सकता है। जब हम किसी चीज़ को पाने के लिए बहुत मेहनत करते हैं और वह हमें मिलती है , तब हमें एहसास होता है कि वह मंजिल नहीं है, मंजिल तो और आगे है।
जीवन में मृगतृष्णा का अस्तित्व हमें यह सिखाता है कि हमें उन चीज़ों के प्रति सतर्क रहना चाहिए, जो हमें आकर्षित करती हैं। हम जीवन में सुख, संतोष और सफलता की खोज में रहते हैं।
उसे ऐसा लग रहा था कि वह नियति के जाल में फंसा हुआ है, और इससे निकलने का एक ही तरीका है – आगे बढ़ना। हर बार उसे लगता था कि यह आखिरी कदम होगा, लेकिन वह जैसे एक चक्र में फंस गया था। मृगतृष्णा के पीछे भागते-भागते उसे एहसास हुआ कि जो वह देख रहा है, वह मंजिल नहीं है, मंजिल तो और आगे है या कही और है। आखिरकार आंतरिक संतुष्टि एक मृगतृष्णा ही है, मानो तो है , न मानो तो कही भी नहीं।
अपने अंतर्मन को सून सकते हैं वही इस मृगतृष्णा से अपने आप को बचा सकने में कामयाब होते है।
जाल में फंसने वाली मछली को उसमे लगे भक्ष्य के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता, उसका मन उस मोह की तरफ खींचा चला जाता है, उसी तरह कुदरत ने बुने हुए जाल को अनदेखा कर वो सामने आने वाले हर मौके को अपनाते हुए मंजिल की एक एक सीढ़ी चढ़ जाता है।
उसने अपने जीवन में आए हर मौके को सकारात्मक रूप से लिया, और उन मौकों के माध्यम से वह आगे बढ़ता रहा। लेकिन सफलता की एक-एक सीढ़ी उसे ऊपर ले जा रही थी, लेकिन हर सीढ़ी के पीछे एक नई मृगतृष्णा छिपी हुई थी। जिसे पहचानना हमेशा संभव नहीं होता।
हर बार मुश्किलों से बाहर निकल सफलता हासिल करने के बाद, मृगतृष्णा के पीछे भागते हुए उसे पछतावा होता है, लेकिन फिर भी उसे आगे बढ़ने के अलावा और कोई रास्ता नहीं होता, और इसी कोशिश ने उसके पैरों तले एक और सीढ़ी बनाई होती है। और यही सीढ़ी उसके आत्मविश्वास को बढ़ावा देती है एवं उसके लिए एक अदृश्य मृगतृष्णा रूपी जाल रख जाती है।
हर अनुभव से वो सीख रहा था, लेकिन उसके मन में एक सवाल बार-बार उठता था – यह सच है या मृगतृष्णा? जो सपने हम देखते हैं, क्या वे वास्तव में हमारे लिए होते हैं?
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में सफलता रूपी मृगतृष्णा के पीछे भागने के बजाय हमें अपने अंतर्मन की आवाज पर ध्यान देना चाहिए।
देखते है सुशांत और मृगतृष्णा की ये आंखमिचौली क्या रंग लाती है।
