मृगजल – ३
वो अपने आत्मविश्वास के बल पर चलने की कोशिश तो कर रहा था, लेकिन अंदर ही अंदर एक अजीब सी बेचैनी उसे खाए जा रही थी।
वो कभी लोगों की बातचीत का केंद्र हुआ करता था और उसकी मुस्कान – वो तो जैसे एक प्रेरणा का स्रोत थी।
लेकिन अब? उसके मन में एक खालीपन घर कर गया था।
उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि अब किसी भी चीज़ में रुचि क्यों नहीं रह गई। वो न कुछ करना चाहता था, न किसी से बात, मानो जीवन की धारा में उसका कोई बहाव ही न हो। उसके भीतर की उथल-पुथल को कोई देख नहीं सकता था।
वो अब रोज़ खुद को ज़बरदस्ती ऑफिस लाता। टेबल पर बैठकर स्क्रीन की रोशनी में खुद के अंधेरे को छुपाने की नाकाम कोशिश करता। लोग उसके शांत चेहरे को “फोकस्ड” समझते, पर शायद वह बस खुद से लड़ रहा होता।
आत्मा में उठती हूक, मन में डूबता सूरज और उस पर चढ़ती उम्मीदों की चादर, वो हर दिन किसी बगावत के किनारे पर खड़ा था।
बॉस को आज भी उस पर पूरा भरोसा था। वो अक्सर कहते, “सचिन अगर ज़ीरो पर आउट हो जाए, तो भी कोई उसकी उम्मीद नहीं छोड़ता।” ये सुनकर वो मुस्कुरा देता, बस दूसरों को यह यकीन दिलाने के लिए कि वह जल्द वापसी करेगा।
दीवार पर टंगे उस राष्ट्रीय स्तर के अनुसंधान सम्मेलन के प्रमाणपत्र को वह देखता और खुद ही पर हँस देता। एक समय था जब यही प्रमाणपत्र उसकी मेहनत और सफलता की गवाही देते थे, पर अब वो बस एक कागज़ के टुकड़े जैसे लगते थे।
कहीं कुछ छूट गया था… यही खलिश उसे चैन से जीने नहीं देती।
उसने छुट्टी ली, सोचकर कि शायद कहीं शांति मिल जाए। कभी-कभी वो किसी किले पर जाकर बैठ जाता, जहां नीचे की खाई और ऊपर का आकाश, दोनों एक समान डर और आकर्षण लिए होते। घंटों बैठा रहता, तो कभी सागर किनारे लहरों की आवाज़ों में खुद को ढूंढता। कभी घर की छत पर रात भर जागकर आकाश को ताकता रहता।
खुद से पूछता, “क्या मैं गिरने से डर रहा हूँ, या फिर उड़ने से?”
सागर भी उसकी कई बातों का गवाह हमेशा से ही बनाते आया है… ।
लहरों की निरंतरता में उसने जीवन के ठहराव को देखा। कभी वो लहरें उसे थपथपाकर उठाना चाहतीं, तो कभी उसके मौन को और गहरा बना देतीं। मगर कोई उत्तर नहीं था, बस प्रतीक्षा।
हर दिन एक नई शुरुआत की उम्मीद में आंखें खुलती और हर दिन एक नई निराशा उसे घेर लेती। आत्मविश्वास लगातार डगमगा रहा था, गलती पर गलती हो रही थी। जहां एक ओर लोग उसकी विफलताओं को गिनने लगे थे, वहीं दूसरी ओर अनजाने में ही वह एक नई सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा था।
अंदर से वह पूरी तरह टूट चुका था, लेकिन बाहर की दुनिया उसकी उपलब्धियों से प्रभावित थी। जितनी ऊंचाइयों तक वह पहुंचता गया, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारियां उसके कंधों पर आ बैठती।
आज भी, भले ही वो कुछ पल के लिए ठहर गया हो, उसकी उपलब्धि और काम के प्रति समर्पण चर्चा का विषय है। वहीं उसे लग रहा है कि उसने कुछ भी हासिल नहीं किया जो उसे आत्मसंतोष दे सके। शायद आज भी उसे लग रहा है के उसे एक नई शुरुवात या बदलाव की आवश्यकता है।
अब वह अकेले रहना चाहता था। काम के घंटे उसे कम लगने लगे थे। हर समय खुद को व्यस्त रखना ही उसे अपनी मानसिक स्थिति से दूर रखने का तरीका लगने लगा। उसे एक ऐसे मौके की तलाश थी जो उसे इस स्थिति से बाहर निकाल सके। उसे थकान हो गई थी, भीतर से, बाहर से, जीवन से।
एक दिन, थक हारकर, उसने खुद से एक सवाल पूछा, “मैं कौन हूं? मैं किसके लिए भाग रहा हूं?”
जवाब आया, “अब थम जा। ज़रा साँस ले। सिर्फ जीने के लिए जी।” जैसे किसी की आवाज उसके कानों में गूंज रही हों।
उस दिन वह ऑफिस नहीं गया। उसने अपना फोन स्विच ऑफ किया।
फिर एक दिन, अचानक ही, जैसे भीतर की कोई गांठ टूट गई हो। वो उठा, बॉस को कॉल किया की कुछ पर्सनल वजह है, उसे अगले ३ दिन गांव जाना पड़ेगा। मोबाइल स्विच ऑफ किया, बैग उठाया और बस स्टेशन पर जा खड़ा हुआ।
किसी ट्रेन में बैठा. बिना नाम, बिना गंतव्य, सिर्फ दिशा चुनी, पश्चिम, जहां जैसे सूरज की डूबती सुनहरी किरणें उसका इंतजार कर रही हों।
ट्रेन उसे एक छोटे से पहाड़ी गांव ले गई, जहां न वाई-फाई था, न डेडलाइन। वहाँ समय बहता नहीं था, बस ठहरता था। वहाँ के लोग कम बोलते थे, ज़्यादा मुस्कुराते थे। उनके पास शायद शब्दों से ज़्यादा स्पर्श, और बर्ताव, बातों में सच्चाई थी।
वो वहाँ रहा, घंटों, दिनों, फिर हफ्तों।
हर सुबह की ताज़ी हवा, पहाड़ों पर खेलती धूप, और नदी की बहती धुन – जैसे उसके भीतर के शोर को धीरे-धीरे सुला रही थीं।
एक बूढ़े किसान ने उससे कहा, “ज़िंदगी तब समझ में आती है, जब उसे पकड़ने की नहीं, महसूस करने की कोशिश करो।”
उसने खुद को पकड़ना बंद किया… बस महसूस किया।
वो मिट्टी में हाथ डालता, बच्चों के साथ पत्थर उछालता, पहाड़ियों पर चढ़ता, सूरज को डूबते हुए देखता और उस पूरे मौन में, उसे खुद की आवाज़ सुनाई दी।
अब वह वही सुशांत नहीं था जो कुछ समय पहले खुद को खो चुका था, वो खुद से जुड़ा हुआ था। वह जान गया था कि आत्मविश्वास कोई शोर नहीं होता, वह तो वो मौन होता है जो तब भी साथ देता है जब पूरी दुनिया चुप हो जाए।
वो वापस लौटा, तो वही दुनिया थी, वही ऑफिस, वही बॉस , वही पुरानी कुर्सी।
पर अब कुर्सी पर बैठा इंसान नया था।
अब वह नहीं दौड़ रहा था, चल रहा था।
धीरे, सधे क़दमों से, हर पल को जीते हुए।
अब उसे जीवन को जीतना नहीं था – उसे बस महसूस करना था।
क्रमशः
