मृगजल – २
धूप अभी नई थी, वैसी ही जैसे वो किसी के मन में पहली बार उगता हुआ कोई सवाल हो।
खिड़की से छनकर आती धूप उसके चेहरे पर गिर रही थी, पर आँखें दूर कहीं और थीं, जहाँ न रोशनी थी, न अंधेरा, बस एक विचार की झलक थी।
वह रोज़ की तरह वही खडा था, जहाँ से वह आसमान का वह कोना देख सकता था जो खिड़की के बाहर हर दिन बदलता था। कभी धूप में चमकता, कभी बादलों से ढँकता।
एक ऐसा लड़का, जो सपनों को रंगों की तरह नहीं, ध्वनियों की तरह महसूस करता था, कभी धीमी, कभी तीखी, कभी खामोश।
उसका दोस्त कहता, “दोस्त, तुम्हारा मन बहुत गहराई में रहता है… कभी-कभी ज़मीन पर भी आ जाया करो।”
सुशांत सिर्फ़ मुस्कुरा देता।
शायद यहीं उसकी सोच ने पंख फैलाने शुरू किए।
जब उसके हमउम्र बच्चे नंबरों की होड़ में भाग रहे थे, वह पुराने अख़बारों की कतरनें इकट्ठा कर रहा था — जिनमें प्रेरणादायी लोगों की कहानियाँ और बदलाव की चीखें छपी थीं।
वो पूछता, “क्या हम सिर्फ़ अपने लिए जीते हैं?”
और जब कोई उत्तर नहीं देता, तो वह खुद ही जवाब ढूँढने निकल पड़ता।
वो लड़का जो किताबों से कम, लोगों से ज़्यादा सीखता था।
जो जब किसी मज़दूर को अपने फटे जूतों के साथ हँसते देखता, तो सोचता, “खुशी शायद परिस्थितियों में नहीं होती, सोच में होती है…” लेकिन साथ ही उसे नए जूते दिलाने की व्यवस्था के बारे में सोचता।
एक बार जब उसे पूछा गया, “सफलता क्या है?”
उसने जवाब दिया, “सफलता वो है, जो किसी और को भी अपने जीवन पर गर्व करने का मौका दे सके।”
उसकी यह बात शायद किसी के लिए एक वाक्य थी, लेकिन उसके लिए वह एक बीज था।
एक ऐसा बीज, जिसे उसने अपने मन की मिट्टी में बो दिया था, उम्मीद के पानी से सींचा था। हमेशा एक अलग सोच का समर्थक, उसकी आँखों में सपने थे, लेकिन वो सिर्फ़ अपने लिए नहीं थे, वो थे अपने आसपास के लोगों के लिए, समाज के लिए, और अपने अस्तित्व के लिए।
इसमें कोई शक नहीं था कि वो एक स्ट्रगलर था। वह एक विद्यार्थी ही तो था, हर पल से कुछ न कुछ सीखता था। जो कोई भी उसके संपर्क में आता, सुशांत को उसमें एक बेहतरीन मार्गदर्शक दिखता, और यही वह रहस्य था जिसकी वजह से वो बड़ी सहजता से उस कठिन रास्ते पर चलता गया…
बचपन से ही थोड़ा अलग, जहाँ बाकी बच्चे स्कूल में सफलता की परिभाषा अंकों में ढूँढते थे, वहाँ वो उसे अनुभवों में तलाशता था। और इसी खूबी के कारण आज तक उसकी अलग पहचान बनी हुई है।
उसे किताबों से ज़्यादा लोग सिखाते थे। हर नई मुलाकात, हर नया अच्छा – बुरा अनुभव उसके लिए एक नया सबक होता, अच्छे के साथ साथ बुरे अनुभव का भी वह हंसते हुए स्वागत करता है। वह बहुत सुनता था। बड़ों का भी, और छोटों का भी। इसलिए उसने जल्दी ही समझ लिया था कि सफलता केवल तालियों में नहीं होती, वो होती है हार के बाद फिर से खड़े होने में। और सफलता वही दूसरों की आँखों और दिलों में जगह लेती है, जब आपकी सफलता दूसरों के लिए प्रेरणादायक और गर्व की बात बने।
लेकिन उसने ये भी जल्द ही जान लिया था कि यह कल्पनाओं की सफलता केवल एक संघर्ष है, जिसमें सफलता मिलेगी या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं होती… क्योंकि सफलता की कोई सीमा नहीं होती, पर उसकी भूख हर किसी के अंदर होती है, किसी की संतोष से पूरी होती है, और किसी की बढ़ती ही जाती है।
शुरुआत में, उसकी सहजता से मिली सफलता ने उसे एक अलग पहचान दी, लेकिन उस पहचान को बनाए रखने का दबाव उसने कभी महसूस नहीं किया। शायद उस वक़्त उसे ये समझ नहीं आया था कि ये जो कुछ भी मिल रहा है, उसका मूल्य क्या है।
कई बार तो ऐसा भी लगा कि अगर कोई उसे यह समझा देता, तो शायद वह गंभीरता से सोचता। लेकिन उसका स्वभाव ऐसा नहीं था – वह बस दौड़ता था, अपने आनंद के लिए, अपनी शर्तों पर… और कभी-कभी दौड़ से हटकर कुछ पल रुकने के लिए।
अनजाने में ही उसने अपने आलोचकों को प्रशंसकों में बदल दिया था। कुछ अपवादों को छोड़कर, उसने अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाई थी और गहरी आत्मविश्वास के साथ वह आगे बढ़ता जा रहा था।
उसका वह शांत, सौम्य स्वभाव लोगों के दिलों में बसता गया। हमेशा ज़मीन से जुड़ा रहा, शायद इसी ज़मीनी जुड़ाव के कारण उसे कभी यह अहसास ही नहीं हुआ कि वह वाकई दूसरों से अलग है।
जैसे मौसम में बदलाव आता है, वैसे ही उसके मन में भी एक हलचल शुरू हो गई थी, लेकिन यह हलचल समझ पाने लायक नहीं थी। उसके भीतर कुछ खो रहा था। उसकी सहजता, उसका बालसुलभ उत्साह… शायद यह सब दबाव, अपेक्षाएं, या हर समय कुछ साबित करने की बेचैनी का असर था। शायद इसीलिए वह अपनी ज़िम्मेदारियों का अहसास नहीं कर पा रहा था।
उसकी आँखों में एक चमक थी और चेहरे पर हमेशा की तरह मुस्कान। इसी वजह से न तो वह खुद और न ही कोई और उसकी अस्थिरता को समझ पाया।
लेकिन कहीं दूर बैठी एक अदृश्य शक्ति उसे देख रही थी – जैसे कोई गुरु अपने प्रिय शिष्य की चालाकी नहीं बल्कि लापरवाह नज़र में भी परख कर रहा हो। और उसी गुरु रूपी शक्ति ने उसे चेतावनी भी दी थी कि कहीं वह अपनी पहचान न खो जाए। लेकिन आत्मविश्वास से भरे सुशांत ने उस चेतावनी को नज़रअंदाज़ कर दिया… और शायद यही उसकी पहली चूक थी।
एक बार किसी शुभचिंतक उद्यमी ने सुशांत से पूछा, “आपका अगला सपना क्या है?”
और एक किताब भेट दी – “एक दिशा का शोध”।
वो कुछ पल चुप रहा। वो सवाल उसके लिए मानो अनुत्तरित था। कौन-सा सपना चुने – इसी उलझन में वह खो गया और कोई उत्तर नहीं दे पाया। वह एक अदृश्य चक्रव्यूह में उलझ चुका था, जहाँ बाहर से सब कुछ ठीक था, पर अंदर से वह खुद को खाली महसूस कर रहा था…
यह चरण उसके लिए सबसे कठिन था। क्योंकि इस बार लड़ाई बाहर की दुनिया से नहीं, बल्कि अपने भीतर के मन से थी।
इस बेचैनी से बाहर निकलने के लिए उसने थोड़ा समय खुद के लिए निकाला। और सच में, उसे एक दिशा की तलाश थी, लेकिन वो दिशा क्या थी? इसी विचार में उसकी पूरी रात निकल गई।
शहर से दूर, एक छोटे से आदिवासी गाँव में वह दो दिन के लिए गयाl जहाँ न सोशल मीडिया था, न प्रतियोगिता का दबाव, और न ही तुलना की होड़। वहाँ की साधारण जीवनशैली में उसे फिर से अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनाई दी। और उसे हल्का-सा अहसास हुआ कि शायद उसे वह दिशा मिल गई है। वहाँ हर क्षण, हर लम्हा जैसे प्रकृति ने सिर्फ़ अपने आप के लिए भेजा था।
संघर्ष तो हर किसी का होता है, हर परिस्थिति में अपरिहार्य। लेकिन आत्मशोध से एक नया अध्याय लिखा जा सकता है। यह बात अब उसे समझ में आ गई थी।
कभी-कभी हमें खुद का आईना बनकर खुद को देखना पड़ता है, क्योंकि दुनिया को जीतने से पहले खुद को जीतना ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है।
उतार-चढ़ाव तो हर किसी की ज़िंदगी का हिस्सा होते हैं और वो कोई अपवाद कैसे हो सकता था? नियति का यह नियम उस पर भी लागू हुआ।
उसकी वही सहजता अब उसे धीरे-धीरे आगे का रास्ता दिखा रही थी, नए सपनों के साथ, नए विचारों के साथ, और सबसे ज़रूरी… एक पारदर्शी मन के साथ।
अब सवाल ये था… क्या यह रास्ता उसे उस परिस्थिति से बाहर निकालेगा, या किसी और अदृश्य चक्रव्यूह में फँसा देगा?
इसका उत्तर तो आने वाला वक़्त ही देगा..
