मिल न रहे शब्द
कविता बस कहीं खो गई,
मिल न रहे शब्द मुझे,
न मिल रही दिल की आवाज कहीं।
मन के भीतर गूंजती लहरें,
भावनाएँ जैसे मौन बनीं,
हर अल्फ़ाज़ अधूरा लगता,
जैसे कहानी बिना धुन की।
कलम उठी थी जुनून में कभी,
अब बस थक कर रुक सी गई,
वो जज़्बात जो बहते थे सहज,
अब बूँद बूँद में सिमट सी गई।
पर मैं रुकूँगा नहीं, ठहरूँगा नहीं,
ये विराम भी एक राह है नई,
शब्द फिर लौटेंगे इक दिन,
जब धड़कन बोले कविता कहीं।
12.08.2016
