माहिष्मती
माहिष्मती प्राचीन भारत की एक नगरी थी जिसका उल्लेख महाभारत तथा दीर्घनिकाय सहित अनेक ग्रन्थों में हुआ है। (आईये जानते है माहिष्मती साम्रज्य के बारे मे, जो आजके बिहार, मध्यप्रदेश से गंधार (अफगाणिस्तान) तक शासन करता था |)
चंद्रवंश एक प्रमुख प्राचीन भारतीय क्षत्रियकुल। आनुश्रुतिक साहित्य से ज्ञात होता है। कि आर्यों के प्रथम शासक (राजा) वैवस्वत मनु हुए। उनके नौ पुत्रों से सूर्यवंशी क्षत्रियों का प्रारंभ हुआ।
मनु की एक कन्या भी थी – इला। उसका विवाह बुध से हुआ जो चंद्रमा का पुत्र था। उनसे पुरुरवस् की उत्पत्ति हुई, जो ऐल कहलाया और चंद्रवंशियों का प्रथम शासक हुआ। उसकी राजधानी प्रतिष्ठान थी, जहाँ आज प्रयाग के निकट झूँसी बसी है।
पुरुरवा के छ: पुत्रों में आयु और अमावसु अत्यंत प्रसिद्ध हुए। आयु प्रतिष्ठान का शासक हुआ और अमावसु ने कान्यकुब्ज में एक नए राजवंश की स्थापना की।
कान्यकुब्ज के राजाओं में जह्वु प्रसिद्ध हुए जिनके नाम पर गंगा का नाम जाह्नवी पड़ा। आगे चलकर विश्वरथ अथवा विश्वामित्र भी प्रसिद्ध हुए, जो पौरोहित्य प्रतियोगिता में कोसल के पुरोहित वसिष्ठ के संघर्ष में आए।ततपश्चात वे तपस्वी हो गए तथा उन्होंने ब्रह्मर्षि की उपाधि प्राप्त की। आयु के बाद उसका जेठा पुत्र नहुष प्रतिष्ठान का शासक हुआ। उसके छोटे भाई क्षत्रवृद्ध ने काशी में एक राज्य की स्थापना की।
नहुष के छह पुत्रों में यति और ययाति सर्वमुख्य हुए। यति संन्यासी हो गया और ययाति को राजगद्दी मिली। ययाति शक्तिशाली और विजेता सम्राट् हुआ तथा अनेक आनुश्रुतिक कथाओं का नायक भी।
उसके पाँच पुत्र हुए – यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु, अनु और पुरु।
इन पाँचों ने अपने अपने वंश चलाए और उनके वंशजों ने दूर दूर तक विजय कीं। आगे चलकर ये ही वंश यादव, तुर्वसु, द्रुह्यु, आनव और पौरव कहलाए। ऋग्वेद में इन्हीं को पंचकृष्टय: कहा गया है।

माहिष्मती
यादवों की एक शाखा हैहय नाम से प्रसिद्ध हुई और दक्षिणापथ में नर्मदा के किनारे जा बसी। माहिष्मती हैहयों की राजधानी थी और कार्तवीर्य अर्जुन उनका सर्वशक्तिमान् और विजेता राजा हुआ। जिसका उल्लेख सहस्त्रबाहू किया गया है (हजार भुजाओ के बल )
माहिष्मती प्राचीन भारत की एक नगरी थी जिसका उल्लेख महाभारत तथा दीर्घनिकाय सहित अनेक ग्रन्थों में हुआ है।
बाद में यह अनूप महाजनपद की राजधानी भी रही। भारतीय प्राचीन साहित्य में माहिष्मती नगर के बारे में कई सन्दर्भ दिये गये हैं, लेकिन इसकी सही स्थिति पर मतैक्य नहीं है।
५०० वर्ष ईसापूर्व में भारत के महाजनपद और जनपद: –
अवन्ति महाजनपद के दक्षिणी भाग में यह सबसे महत्वपूर्ण नगरी थी।
एक मान्यता यह है कि माहिष्मती वर्तमान समय के मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के तट पर स्थित माहेश्वर नगर और उसके आस पास के क्षेत्र तक फैली थी।
कहा जाता है कि यह नगरी १४ योजन की थी और पांडवकालीन शिव मंदिर वाला गाँव चोली (तहसील महेश्वर, जिला खरगोन, मध्यप्रदेश) तक फैली हुई थी।
माहेश्वर के समीप ही नर्मदा नदी के तट पर स्थित नगर मंडलेश्वर में आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के मध्य विश्व प्रसिद्ध शास्त्रार्थ हुआ था | उक्त स्थान वर्तमान में छप्पन देव मंदिर कहलाता है।
माहिष्मती नामक नगर की स्थापना नर्मदा नदी के किनारे हैहय वंश के राजा ‘महिएतम’ ने की थी।

माहिष्मती नगर के बारे में कुछ धारणाएं निम्नलिखित हैं।
१. यह नर्मदा के तट पर स्थित थी।
२. यह उज्जयनी नगर के दक्षिण और प्रतिष्ठान नगर के उत्तर में थी, यह इन दोनों नगरों के मध्य स्थित थी। महर्षि पतंजलि ने उल्लेख किया है कि जो यात्री उज्जयनी से यात्रा प्रारंभ करता था तो माहिष्मती नगर में सूर्योदय होता था।
३. यह अवन्ति साम्राज्य में स्थित था। यह कई बार इस साम्राज्य से अलग भी दर्शाया गया है। यह अनूप महाजनपद की राजधानी भी रही।
४. अवन्ति विन्ध्य पर्वत के द्वारा दो भागों में विभाजित थी। उज्जयनी उत्तरी भाग तथा माहिष्मती दक्षिणी भाग में स्थित था।

कार्त्तवीर्य अर्जुन (सहस्रबाहु) हैहय वंश का प्रतापी राजा हुआ करता था।
तुर्वसुके वंशजों ने पहले तो दक्षिण पूर्व के प्रदेशों को अधीनस्थ किया, परंतु बाद में वे पश्चिमोत्तर चले गए। द्रुह्युओं ने सिंध के किनारों पर कब्जा कर लिया और उनके राजा गांधार के नाम पर प्रदेश का नाम गांधार पड़ा। आनवों की एक शाखा पूर्वी पंजाब और दूसरी पूर्वी बिहार में बसी। पंजाब के आनव कुल में उशीनर और शिवि नामक प्रसिद्ध राजा हुए।
पौरवों ने मध्यदेश में अनेक राज्य स्थापित किए और गंगा-यमुना-दोआब पर शासन करनेवाला दुष्यंत नामक राजा उनमें मुख्य हुआ। शकुंतला से उसे भरत नामक मेधावी पुत्र उत्पन्न हुआ। उसने दिग्विजय द्वारा एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की और संभवत: देश को भारतवर्ष नाम दिया।
चंद्रवंशियों की मूल राजधानी प्रतिष्ठान में, ययाति ने अपने छोटे लड़के पुरु को उसके व्यवहार से प्रसन्न होकर – कहा जाता है कि उसने अपने पिता की आज्ञा से उसके सुखोपभोग के लिये अपनी युवावस्था दे दी और उसका बुढ़ापा ले लिया – राज्य दे दिया। फिर अयोध्या के ऐक्ष्वाकुओं के दबाव के कारण प्रतिष्ठान के चंद्रवंशियों ने अपना राज्य खो दिया।
परंतु रामचंद्र के युग के बाद पुन: उनके उत्कर्ष की बारी आई और एक बार फिर यादवों और पौरवों ने अपने पुराने गौरव के अनुरूप आगे बढ़ना शुरू कर दिया। मथुरा से द्वारका तक यदुकुल फैल गए और अंधक, वृष्णि, कुकुर और भोज उनमें मुख्य हुए।
कृष्ण उनके सर्वप्रमुख प्रतिनिधि थे। बरार और उसके दक्षिण में भी उनकी शाखाएँ फैल गई। पांचाल में पौरवों का राजा सुदास अत्यंत प्रसिद्ध हुआ। उसकी बढ़ती हुई शक्ति से सशंक होकर पश्चिमोत्तर भारत के दस राजाओं ने एक संघ बनाया और परुष्णी (रावी) के किनारे उनका सुदास से युद्ध हुआ, जिसे दाशराज्ञ युद्ध कहते हैं और जो ऋग्वेद की प्रमुख कथाओं में एक का विषय है। किंतु विजय सुदास की ही हुई।
थोड़े ही दिनों बाद पौरव वंश के ही राजा संवरण और उसके पुत्र कुरु का युग आया। कुरु के ही नाम से कुरु वंश प्रसिद्ध हुआ, उस के वंशज कौरव कहलाए और आगे चलकर दिल्ली के पास इंद्रप्रस्थ और हस्तिनापुर उनके दो प्रसिद्ध नगर हुए। कौरवों और पांडवों का विख्यात महाभारत युद्ध भारतीय इतिहास की विनाशकारी घटना सिद्ध हुआ।
सारे भारतवर्ष के राजाओं ने उसमें भाग लिया। पांडवों की विजय तो हुई, परंतु वह नि:सार विजय थी। उस युद्ध का समय प्राय: 1400 ई.पू.
23.12.2018
