” बंधन “
यु ही बेवजह कोई किसी को नहीं जानता,
पूर्व-जनम का खोया यहा हर कोई मिलता|
सुनते-सुनते उसके अंतर्मन सजते है,
वह सुन ले तो अपने आप को हम भुलते है।
एक शब्द नहीं, बल्कि एक सपना अनजाने में गाया गया,
एक अकथनीय प्रेम यहाॅं विधाता से लिखा गया ।
उलझे हुए धागों को फिर से मोड़ देते है,
सहज ही यादो का आनंद राग गाते है।
हर जगह खोई हुई यादों का जरिया है,
कभी-कभी यादों के बादलों मे खोना हैं।
उनमें एक नहीं,
अनेक प्रतिबिम्ब प्रकट हुए,
सखी, सजनी, पत्नी से एकाकार हो गए।
आत्मा से आत्मा मिलन के लिए रिश्ता ये रचा हुवा,
विधी ने अनजाने में इसे इस तरह लिख दिया।
उसके चेहरे पे मुस्कराहट अनेकों दिखती रहे,
लज्जित उसे देख महकती कली भी खिलती रहे।
यह गांठ जन्म-जन्मान्तर ऐसी ही रहे,
खो जाए तो भी राह बार-बार मिलती रहे।
विधाता से रहती अभी एक ही गुजारिश,
अनुभव करें वो सारे उसके सपनों कि ख्वाइश….
20.09.20
