” फुल वाली “
देख उसकी अदा कोई संभल कर भी फिसले,
चुपके चुपके शब्द उसके होठों से यूं निकले,
दिल ने कहा उसपर हम कुछ तो लिख लें,
उसके मुंह से अपना नाम सुन हम बैठे सबकुछ भूले…
लाल ड्रेस पहन आई वो लाल गुलाब लेकर,
बेहोश हो गए हम उसके गाल गुलाबी देख कर,
होठों पे लाली उसकी आंखे थी शराबी,
घायल करती उसकी हसीं भी बेहिसाबी,
गुलाब हमे किसी ने इतने दिए,
की लगाये हमने फूलों के ठेले,
खरीददार उस फूल के इतने आ गए,
की कभी न लगा की हम है अकेले,
एक न बेचा हमने सारे के सारे संजोए,
किताबों में आज भी वो फूल मिल जाते है,
देख उन्हें बीबी जानबुझ कर छेड़ती है,
” खत उसने जो लीखा था हमने भी पढा है “
हम भी बोल देते है…
” वो प्रेम-पत्र वाली थी,
ये फुल वाली सुगंधा है,
तेरे आने से ही जो रूठ के चली गई थी,
मुलाकात हमारी सिर्फ
तेरी वजह रही थी,
फिर भी फोन पर हालचाल वो मेरा पूछा करती है, 

तुम खुश तो हो ना ?
कोई तकलीफ तो नही ना? 
बिबी से अपने तुम संभाल के रहना?
परेशान उसने किया तो मुझे तुम बोलना ?
क्या बताऊं अब तुम्हे,
गलती जो हुई है,
मिल रहा था चांद हमे,
कोहिनूर हम घर ले आए है “,
मुंह टेडा कर बीबी भी कहती है…
” बस हो गयी अब…नौटंकी तुम्हारी,
उठो जल्दी से अब.. नानी आ रही हैं आज हमारी…”
सुनते ही ये… मेरी नींद उड़ गई,
छुट्टी के दिन की प्लानिंग चुटकी में भाग गई…..
22.03.14
