पूर्व संचित
भोर की बगिया में खिला एक फूल,
तेरी कृपा से जीवन हुआ अनुकूल।
ओस की बूँदें फूलों पर चमके,
जैसे नभ में तारे हर दिशा में दमके।
तेरी सरगम में जब बहता मन मेरा,
जैसे छू जाता है गगन का सवेरा।
हवा में घुली भक्ति की मधुरिमा,
हर कण में बसी शारदा की गरिमा।
कोमल किरणें उतरती जब नभ से,
धरती सजती प्रेम के रत्नाभरण से।
फूलों की महक और आरती के बोल,
जैसे स्वयं स्वर्ग से बरसे हों अनमोल।
सृष्टि की मिट्टी में तेरी भक्ति का गंध,
हर जीव में गूंजे तेरा स्मरणमय छंद।
पूर्व संचित पुण्य जब फलित रूप पाता,
तो अनजाने में तुझे ही हर रूप में देखता।
तेरा नाम जपूँ मैं हर साँस, हर भाव में,
तू ही बस जाए मेरी आत्मा के प्रवाह में।
तू प्रेरणादायिनि, वीणावादिनी,
तू ज्ञानदायिनी करुणासिन्धुनी।
तू ही भावों की भाषा, तू नाद की जननी,
तुम बिन अधूरी हर साधना, हर ध्वनि।
हे माँ शारदे! तुझसे ही सजती मेरी हर वाणी,
तेरे चरणों में समर्पित मेरी जीवन कहानी।
28.06
