पहलगाम
पहलगाम के बारे में स्कूल में पढ़ा था,
तबसे वहां जाने का लाखों का सपना था।
जाते हुए कदम ऐसे अचानक से रुक गए,
गए हुए जिंदा भी जैसे जीते जी मर गए।
आतंकियों ने देश को सारे रुला दिया,
मासूमों के विश्वास का सबक ये मिल गया।
सावल ये है के सुरक्षा है कहां?
मणिपुर हो या कश्मीर,
सुरक्षित कौन यहां?
हर जगह दिखनेवाली मिलिट्री कैसे कहा खो गयी?
१ लाख ८० हजार आर्मी भर्ती जो ना हुयी।
अग्निवीर हम सस्ते में खोज लाए,
बॉर्डर पे भेज उन्हें, घर में आतंकी घुस आए।
मारकर मासूमों को हंसते हुए जो चले गए,
बेबस परिवार वहां मिलिट्री खोजते रहें।
५६ इंच की छाती अब हर किसी की सिमट गई,
दुनिया का युद्ध रोखते रोखते, घर में ही नाक कट गई।
सावल ये नहीं कि जिम्मेदार कौन है,
यही एक सवाल की कब तक सहिष्णु रहें।
७७ साल बाद भी असुरक्षित हर कोई वहां,
कश्मीरी पंडित कहें, इस स्वर्ग-नरक में फर्क कहां।
क्षात्र धर्म अब हर किसी को अपनाना है,
हर हर महादेव अब हर किसी का नारा है।
26.04.25
