४. ” क्या बोलूँ तुझसे “
(…..आगे…..)
सुश्या के दिमाग में भी विचार रुक नहीं रहे थे,
उसका मन जैसे घड़ी की सुइयों के साथ-साथ सपनों में दौड़ रहा था…
…….
दिमाग में अब बस तेरा ही ख्याल रखूं,
क्या बोलूँ तुझसे, अब कुछ जो तुझे दुख दे,
अपने मन को अब मैं खुद ही समझाता हूँ,
बिन तेरे कैसे कटेगा आज का दिन,
सोच-सोचकर ही ये बेचैन हो रहा दिल,
रोज़ जाना और चक्रव्यूह से इस रोज़ ही लौट आना,
घड़ी की सुइयों के संग अब ये दौड़ लगाना,
कब मिलोगी मुझसे, तुम वास्तव में सुनने,
अब तक जो मैं बस ख्वाबों में बोलता आया हूँ,
क्या चाहिए मुझे तुम, जीवन साथी के रूप में,
तेरी याद में ये पलकों में भी नमी है,
चल प्रिय, लिखें हम अपनी ही नई कहानी…
– ‘सुश्या’
