३. ” ढाई अक्षर “
(…..आगे…..)
सांझ के समय का इंतज़ार करती हुई
‘सुष्या’ की यादों में
‘सुषी’ बालकनी में गुनगुना रही थी…
” एक नजर मे कर घायल
तुमने मुझपे वार किया,
मुस्कान छुपाते नजरे झुकाते
मैने भी वार पलट दिया,
झूम उठती बारिश कि बुंदे जो
इतराते, लहराते और शरमाते बाल,
अनदेखा कर उन्हे जो
करते थे तुम बुरा हाल,
चोर नजर से देख तुम्हे मै
पानी पानी हो गयी,
ढाई अक्षर सुनने तुम्हारे मै
पीछे पीछे दौड गयी. “
– सुशी
