चांद
चांद कब किसका हुआ,
पल में यहाँ तो पल में वहाँ,
चांदनी भी चांद सी
सबके मन को लुभाती है ,
दुरसे ही अपने साथ
आँख मिचौली खेलती है,
हर कोई कहता है चांद को अपना,
चाँद पर ही लुभाने का इल्जाम क्यो लगाना,
भीड़ भरी चांदनियों में अकेला चांद घूमता है,
अपनी रौशनी में सपनों का दर्पण दिखाता है,
शायद इसीलिए चांद हमे दिल के पास लगता है,
हर कोई उसमें दिल में छुपे कई रिश्तों को देखता है….
