गुफा
ऐसा लगता है,
मेरे अंदर एक अंधेरी गुफ़ा है,
जहा कहिसे एक उगते हुए सूरज की किरन आ रही है,
गुफा लंबी लेकिन दिल को दहला देने वाली है,
जो एक अनजान शांति महसूस कराती है,
बहुत कुछ कही बिखरा हुआ है,
कही कुछ थोड़ा सा समेटा हुआ है,
कही तो थोड़ा बहुत सुकून भरा पल मिलता है,
गुफ़ा की दीवारों और छत पर कुछ तो मुझे निशब्द कर देता है,
न जाने कहा वो एक झरोखा मुझे चलते चलते दिखने वाला है,
ठंडी हवा जहां से इस गुफ़ा में आने वाली है,
जो मेरे इस दहलाते दिल को सहलाने वाली है…
न जाने कहा वो झरोखा दिखने वाला है….
… न जाने कहा…


