कभी-कभी
कभी-कभी कोई एक संध्या दिल के सबसे गहरे कोने में छुपी हुई भावनाओं को धीरे से जगा देती है।
आसमां में फैला सुनहरा रंग, हल्की ठंडी हवा और दिल में घर बना चुकी कोई याद — ये सब जब एक साथ आते हैं, तो अनायास ही मन अतीत के किसी कोने में खो जाता है…
कोई ऐसा रिश्ता, जो कभी शब्दों में नहीं आया, लेकिन दिल से दिल तक बहुत गहराई से जुड़ा रहा। जहाँ कभी अपेक्षाओं का लेन-देन नहीं होता, वहाँ बस होती है मासूमियत, निर्मल, पारदर्शी और पावन भावनाएँ।
कभी एक दूसरे का दिल दुखाने की याद नहीं, पर हर पल बस परवाह… समर्पण जहाँ महसूस होता है… जहाँ याद करके भी याद नहीं आता कि कभी कोई अपेक्षा ज़ाहिर की हो… लेकिन फिर भी एक-दूसरे के मौन मन की भावनाओं का हर पल एहसास बना रहता है।
वे मौन भावनाएँ, जैसे सावन में प्रकृति खिल उठती है, वैसे ही किसी रिश्ते में खुशबू बस जाती है, वहाँ दोस्ती खिलती है। यह रिश्ता कुछ अलग होता है… पर इसका अस्तित्व शब्दों से परे होता है। एक-दूसरे के लिए जो भावनाएँ होती हैं, वे बिना कहे भी समझी जाती हैं।
इस रिश्ते का रहस्य, उसका बिना कहे समझा जाना, सब कुछ एक अलग ही भावनात्मक दुनिया में ले जाता है।
वो घंटों बातें करना, एक-दूसरे को ध्यान से सुनना, कभी वक्त निकालकर मिलना — लेकिन हर रोज़ नहीं, हर पल, हर साँस में एक-दूसरे में खो जाना… ये रोज़ का हिस्सा बन जाता है, जैसे दिनचर्या या जीवन का अभिन्न अंग। लेकिन जो कहना ज़रूरी होता है, वही शायद कभी कहा नहीं जाता… और अगर कभी कहा भी, तो अनसुना कैसे रह जाता है? कभी जताया भी, तो कैसे अनदेखा रह जाता है?… शायद यही असली त्रासदी दोनों तरफ होती है।
झगड़े और फिर उसमें से निकला रूठापन दूर करना, फिर से चांदनी की चमक के साथ, दिल में जमी भावनाओं की धार फिर किसी कॉल से बहने लगती है… यही दिनचर्या बन जाती है। मन तो कभी दुखता नहीं, यही उस रिश्ते की असली खूबसूरती होती है। परवाह होती है, लेकिन वो शब्दों में नहीं कही जाती। वह आँखों से व्यक्त होती है, किसी साधारण हाव-भाव से या बस एक-दूसरे की मौजूदगी से।
ऐसे रिश्तों में समर्पण होता है, लेकिन वह “मैं तुम्हारे लिए कुछ भी करूँगा” इस वाक्य से नहीं, बल्कि “मेरा अस्तित्व तुम्हारे पास शांति से खड़ा है और हर पल मैं तुम्हारे साथ” इस अनुभव से झलकता है।
यह दोस्ती शब्दों से परे होती है, लेकिन सिर्फ दोस्ती कहकर इसकी परिभाषा करना अन्याय होगा — यह रिश्ता उससे भी आगे का होता है, और शायद उससे भी ज्यादा गहरा बंधन इसमें बन चुका होता है…
“कभी न कहा गया और न बाँधा गया, लेकिन अनजाने में ही बंधता हुआ एक बेख़बर बंधन।”
जहाँ अनायास ही होती रहती है सिर्फ मासूम और प्रकृति को भी सुख देने वाली यादों की संग्रह। उन पलों में कुछ माँगना नहीं होता, बस महसूस करना होता है। वे यादें तितलियों की तरह मन में महकती रहती हैं — कोमल, सुगंधित और हमेशा के लिए अपने अस्तित्व को सँजोने वाली।
वो यादें ही काफी होती हैं किसी सुनहरी शाम को किसी सुनसान समुद्र तट पर, या किसी के किले पर, या किसी सबसे ऊँची चोटी पर, या फिर मन के किसी कोने में… चुपचाप बैठ जाने के लिए। उन पलों में हम कुछ भी नहीं माँगते, लेकिन फिर भी ऐसा लगता है जैसे बहुत कुछ पा लिया हो — जो मिल नहीं सकता, ऐसा हमारा भ्रम होता है, और उस भ्रम से भी ये एहसास नहीं होता कि शायद वही हमें चाहिए और शायद इसी असमंजस में फिसले हुए कुछ लम्हे कभी तो महसूस होते है, जैसे वर्तमान का गीत लिखते हुए सुनहरा भविष्य लिखने से पहले ही कागज पलक झपकते ही उड़ गया हों।
शायद यही अनकहे रिश्तों का रहस्यमय धागा हमें उस रिश्ते से फिर-फिर जोड़ता है… एक क्षण के लिए ही सही, पर किसी के मन को लगता है — वो रिश्ता खत्म नहीं हुआ, वो कहीं ना कहीं अब भी ज़िंदा है… मन के किसी कोने में… जिसे शब्दों में कैद नहीं किया जा सकता…
सामने न होने पर भी उस व्यक्ति की उपस्थिति की अनुभूति कभी-कभी खुशी या दुःख के क्षण में हो जाती है, और तब महसूस होता है — इस सृष्टि में वो रिश्ता कहीं न कहीं अब भी ज़िंदा है।
“कभी, कहीं, चलों….फिर से मिलें… उन यादों के साथ… उन्हीं यादों के किनारे पर… चलों चलते है कहीं दूर….”
– सुश्या
( काव्य श्रृंखला “नेत्रा आणि पत्र” से ‘सुश्या’ पात्र से संबंधित अंश यहां प्रकाशित किया गया है। )
